14 Aug 2011

अशआर अहमद फ़राज़

एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है 'फ़राज़'
सुन के मेरे मरने की ख़बर वो रोया क्यों था


इतना तसलसुल तो मेरी साँसों में भी नहीं 'फ़राज़'
जिस रवानी से वो शख्स मुझे याद आता है


मुझ से हर बार नज़रें चुरा लेता है वो 'फ़राज़'
मैंने कागज़ पर भी बना के देखी हैं आँखें उसकी


तुम तक़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
[ इखलास = सच्चाई ]


कुछ अपने मुक़द्दर में अँधेरे थे 'फ़राज़'
कुछ उसकी याद में दिए बुझा कर रोना अच्छा लगा

बहुत अजीब हैं बंदिशें मोहब्बत की 'फ़राज़'
न उसे क़ैद में रखा न हम फरार हुए


बड़ी मुश्किल से कल रात मैंने सुलाया खुद को
इन आँखों को तेरे ख़्वाब का लालच दे कर


ये वफ़ा तो उन दिनों की बात है 'फ़राज़'
जब मकां कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे


लाख़ ये चाह की उस को भूल जाऊं 'फ़राज़'
हौसला अपनी जगह, बेबसी अपनी जगह


कौन तौलेगा अब हीरों में मेरे आँसूं 'फ़राज़'
वो जो दर्द का ताजिर था दूकान छोड़ गया
[ ताजिर = व्यापारी ]


मेरे सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए


अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं


आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिये
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद


मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते


अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला भी है तुम्हे
हज़ार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां


जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम
सुना है 'फ़राज़' कल रात एहसास-ए-तन्हाई से मर गया


सारा शहर उसके जनाज़े में था शरीक
मर गया जो शक्स तनहाईयों के खौफ़ से


'फ़राज़' ग़म भी मिलते हैं नसीब वालों को
हर एक के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाने आते हैं


तुझको ये दुःख है कि मेरी चारागरी कैसे हो
मुझे ये गम है कि मेरे ज़ख्म भर न जाएँ कहीं
[ चारागरी = इलाज ]



इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार मैंने उससे बेवफाई की
[ मुसलसल = निरंतर,लगातार ]

वरना अब तलक यूँ था ख्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या फिर गज़लसराई की

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की
[ आशना = दोस्ती ]

हो चला था जब मुझे इख्तिलाफ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की
[ इख्तिलाफ = असहमति ]

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर है नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की
[ नासेह = सलाहकार ]

फिर क़फ़स में शोर उठा कैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर खबर रिहाई की
[ क़फ़स = जेल ] [ सय्याद = Hunter हंटर]

मेरे
सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए

अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं

आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिए
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद

मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते

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