27 Sept 2012

Dil se Dil ka Rutba Achha laga

Dil  se Dil ka Rutba Achha laga
Aaj Us Ko Sochna Acha Laga
Jate Jate Akhri Lamhaat Main
Mud ke usko Dekhna achhaa laga
Zindagi bhar us ne jo kuchha bhi kiya
Us Ka Har Ek Faisla Achhaa Laga
Har Taraf Thi bawafa logo ki bheed
Ek Wo Hi Bewafa Achhaa Laga..
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Jab Teri Nigahon Main Raha Karte  The
Hum Bhi Chup Chap Phira Karte The
Aankhon Main Piyas Hua Karti Thi¬
Dil Main Toofan Hua Karte The
Log Aate The Gazal Sunane Ko
Hum Teri Batain Kiya Karte The
Kisi Veerane Main Tujh Se Mil Ke
Dil Main Kae Phool Khilla ya Karte The
Ghar Ki Deevar Sajane Ke Leye
Hum Tera Naam Likha Karte The
Wo Bhi Kya Din The Tuje Bhula Kar
Hum Tujhe Yaad Kia Karte The
Kal Tujhe Soch Kar Yaad Aaya
Hum Tujhe Pyar Kia Karte The

Nahi i Ban jata koi apna yunhi dil lagane se,
karni parti hai dua rabse sachha dost pane mein,
rakhna sambhalkar yeh yarana apna,
kahi tut naa jaye kisi or ke aane se.






Zamane se nahin hum tanhai se darte hain,
Pyar se nahin hum rusuvai se darte hain,
Dil meih umang hai tujhse milne ki
Par milne ke baad aane wali judaai se darte hain

Aankhon ki zuban wo samajh nahi pate,
Hoth magar kuch keh nahi pate,
Apni bebasi kis tarah kahe,
Koi hai jiske bina hum reh nahi pate

Badi asaani se dil lgaaye jaate hain
Par badi mushkil se waade nibhaye jaate hain
Le jaati hai mohabbat un raaho par
jaha diye nahi dil jalaaye jaate hain

Hum apni nazar ka izhar isliye nahi karte kyon k
Hum unki han ya na se darte hain,
Agar haan kar di to khushi se mar jayenge,
Agar unhone naaa kardi to ro ro ke mar jayenge ,
Baat ye nahi k hum apni maut se darte hain,
Hamari maut pe beh na jaye unka ek ansoo bhi,
Kyou Ki hum un do ansuon ki kadar karte hain



jidher bhi jaoon nazar mein us ka chehra rahta hai
Wo mere sabhi raastoon mein rahta hai
bichhad kar us se pereshan mein to hoon
par suna hai wo bhi uljhanoon mien rahta hai

Zindagi Udas Hone Ka Naam Nahi,
Dosti Sirf Paas Hone Ka Naam Nahi.
Agar Tum Door rehkar Bhi Hume Yaad Rakho,
Is Se Bada Hamare Liye Koi Inaam Nahi

9.) Phoolon ki har kali khushboo de aap ko,
Suraj ki har kiran roshni de aapko,
Hum to kuch dene ke kaabil nahin,
Dene waala har khushi de aap ko.

10.) Dosti toh sirf ek ittefaaq hai, Yeh toh dilon ki mulaakaat hai, Dosti nahi dekhti yeh din hai ki raat hai, Isme toh sirf wafaadaari aur jasbaat hai !

11.) Log kehte hai ki itni dosti mat karo ke dost dil par sawar ho jaye. Hum kehte hain dosti itni karo ke dushman ko bhi tumse pyar ho jaye

12.) "Hum unka intezaar karte hi reh gaye...
Tumhari judaai ko sehte hi reh gaye...
Dil thamne ki koshish ki magar...
Ye kambakht aansu behte hi reh gaye..."

13.) Dosti mein dil ka tamasha dekha nahi jata, humse tuta hua sisa dekha nahi jata, apne hisse ki khusiya bhi de du tujhe, aye dost tera utra hua chehra dekha nahi jata
14.) "Jo sab dete hain wo hum nahi denge... Pyar jab bhi denge kam nahi denge... Yakin na aaye to aazma lena... Zindagi mein aapko kabhi gham nahi denge...."

21 Sept 2012

रिश्ते बड़े अजीब

1. लहरों की ज़िद पर क्यों  अपनी शक़्ल बदल लेतीं है ,
दिल जैसा कुछ होता होगा शायद इन चट्टानों में।


2. पत्थर से आदमी के हैं रिश्ते बड़े अजीब,
किसी ने मारी ठोकर , और कोई जल चढ़ा गया।


3. अहदे हाज़िर में शराफ़त नहीं जीने देगी,
फूल इक हाथ में, इक हाथ में पत्थर रखना।
 

26 Jul 2012

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक - ग़ालिब

आह को चाहिये इक उम्र असर होने तक
कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक
दामे-हर-मौज में हैं हल्क़-ए-सदकामे-निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होने तक
आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ून-ए-जिगर होने तक
हम ने माना के तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन
ख़ाक हो जायेंगे हम तुम को ख़बर होने तक
पर्तौ-ए-खुर से है शबनम को फ़ना की तालीम
मैं भी हूँ एक इनायत की नज़र होने तक
यक नज़र बेश नहीं फ़ुर्सत-ए-हस्ती ग़ाफ़िल
गर्मी-ए-बज़्म है इक रक़्स-ए-शरर
होने तक
ग़मे-हस्ती का 'असद' किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्म'अ हर रंग में जलती है सहर होने तक

अहद

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी ।

ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा)


कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे (अहमद फ़राज़)

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया (मीर तक़ी 'मीर')

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं (साहिर लुधियानवी)

ऐ ज़िन्दगी एक अह्द मांगता हूँ तुझसे
फ़िर ये ही खेल हो तो मेरे साथ ना हो 

वो जब से उम्र कि बदरिया सफ़ेद हो गयी
एहदे वफ़ा तो छोड़ो मुस्कुराता नहीं कोई


और क्या अहदे वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं,जुदा होते हैं


हमें किसी की अहदे वफ़ा का इल्म नहीं
हम और हमारी महफ़िल बरक़रार रहे

निभानी नहीं आती उसे रस्म अहद वफा की ,
टूटती हैं चूडियाँ हर दिन बेवफाई से



अहद का अर्थ है:
१ प्रतिज्ञा या वचन ।
२ काल या युग ( अहद-ए-संग= प्रस्तर युग)
३ राज्य या सत्ता

30 Apr 2012

मेरी तसवीर में रंग और किसीका तो नहीं

मेरी तसवीर में रंग और किसीका तो नहीं
घेर लें मुझको सब आँखें, मैं तमाशा तो नहीं

ज़िन्दगी तुझसे हर इक साँस पे समझौता करूँ
शौक़ जीने का है मुझको, मगर इतना तो नहीं

रूह को दर्द मिला, दर्द को आँखें न मिलीं
तुझको महसूस किया है, तुझे देखा तो नहीं

सोचते-सोचते दिल डूबने लगता है मेरा
ज़ेहन की तय में ‘मुज़फ्फर’ कोई दरिया तो नहीं

25 Apr 2012

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया
यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुजर जाती थी
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया
कभी तक़दीर का मातम, कभी दुनिया का गिला
मंजिल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया
(गाम == कदम)
जब हुआ जिक्र जमाने में मोहब्बत का ‘शक़ील’
मुझको अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

18 Apr 2012

इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया

     इश्क़ में ग़ैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया
     वरना क्या बात थी किस बात ने रोने न दिया

     आप कहते थे के रोने से न बदलेंगे नसीब
     उम्र भर आपकी इस बात ने रोने न दिया

     रोनेवालों से कह दो उनका भी रोना रो लें
     जिनको मजबूरी-ए-हालात ने रोने न दिया

     तुझसे मिलकर हमें रोना था बहुत रोना था
     तंगी-ए-वक़्त-ए-मुलाक़ात ने रोने न दिया

     एक दो रोज़ का सदमा हो तो रो लें 'फ़ाकिर'
    हम को हर रोज़ के सदमात ने रोने न दिया

     - सुदर्शन फ़ाकिर

12 Apr 2012

अशआर

हर ज़ख्म नया पुराने ज़ख्मों की गिनती घटा देता है
जाने मुझे कब रखना उनके सितम का हिसाब आएगा

--अज्ञात

हमारा तजकिरा छोडो, हम ऐसे लोग हैं जिन को
मोहब्बत कुछ नहीं कहती, वफायें मार जाती हैं

--अज्ञात

लोग सीने में कैद रखते हैं
हमने सर पर चढ़ा लिया दिल को

--अज्ञात

दियो का कद घटाने के लिए रातें बड़ी करना ,
बड़े शेहरो में रहना हो तो बातें बड़ी करना
मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सबको नहीं आता ,
किसी को छोड़ना हो तो मुलाकातें बड़ी करना

--अज्ञात


अभी मसरूफ हूँ काफी, कभी फुरसत में सोचूंगा
के तुझको याद करने में, मैं क्या क्या भूल जाता हूँ

--अज्ञात 

18 Dec 2011

मैं तो यादों के चरागों को जलाने में रहा

मैं तो यादों के चरागों को जलाने में रहा  
दिल कि दहलीज़ को अश्कों से सजाने मे रहा  

मुड़ गए वो तो सिक्को की खनक सुनकर 
मैं गरीबी की लकीरों को मिटाने में रहा

3 Dec 2011

तो क्या बात हो

किताबों के पन्ने पलट कर सोचते हैं,
यूँ ही पलट जाये जिंदगी तो क्या बात हो |
तमन्ना जो पूरी हो ख्वावों में,
हकीक़त बन जाये तो क्या बात हो |

कुछ लोग मतलब के लिए ढूंढते हैं मुझे,
बिन मतलब कोई आये तो क्या बात हो |
क़तल करके तो सब ले जायेंगे दिल मेरा,
कोई बातों से ले जाये तो क्या बात हो |
जो शरीफों की शराफत में  बात न हो,
एक शराबी कह जाये तो क्या बात हो |
जिंदा रहने तक तो ख़ुशी दूँगा सबको,
किसी को मेरी मौत से ख़ुशी मिल जाये तो क्या बात हो

2 Dec 2011

भीग गया पैराहन

भीग गया पैराहन तमाम, दोस्तों के आंसू पोंछने में!
क्यूँ कोई कन्धा हमें रोने के लिए नसीब ना हुआ?
नज़दीक तो आये कई हमसफ़र ज़िंदगी में,
किस्मत है अपनी ऐसी के कोई 'करीब' ना हुआ!

उसने कहा सुन

उसने कहा सुन
अहद निभाने की ख़ातिर मत आना
अहद निभानेवाले अक्सर मजबूरी या
महजूरी की थकन से लौटा करते हैं
तुम जाओ और दरिया-दरिया प्यास बुझाओ
जिन आँखों में डूबो
जिस दिल में भी उतरो
मेरी तलब आवाज़ न देगी
लेकिन जब मेरी चाहत और मेरी ख़्वाहिश की लौ
इतनी तेज़ और इतनी ऊँची हो जाये
जब दिल रो दे
तब लौट आना

9 Oct 2011

ज़मीन तेरी ख़ुदा मोतियों से नम कर दे

सँवार नोक पलक अबरूओं में ख़म कर दे
गिरे पड़े हुए लफ्ज़ों को मोहतरम कर दे

ग़ुरूर उस पे बहुत सजता है मगर कह दो
इसी में उसका भला है ग़ुरूर कम कर दे

यहाँ लिबास, की क़ीमत है आदमी की नहीं
मुझे गिलास बड़े दे शराब कम कर दे

चमकने वाली है तहरीर मेरी क़िस्मत की
कोई चिराग़ की लौ को ज़रा सा कम कर दे

किसी ने चूम के आँखों को ये दुआ दी थी
ज़मीन तेरी ख़ुदा मोतियों से नम कर दे

बशीर बद्र

फिर एक नयी चिता जला रहा हू

फिर एक नयी चिता जला रहा हू

जिस्म सीली लकड़ी जैसे सुलग रहा है
अपनी जली रूह की राख उड़ा कर
रुख हवाओ का दिखा रहा हू

फिर एक नयी चिता जला रहा हू



आज कुछ खुवाब बोए है कागज़ पर
कोशिश है नज्मो को बा - तरतीब करने की
किये जा रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू


कुछ रह गया जो साथ न गया तुम्हारे
दिल की दराजों को फिर से खंगाल कर
आज वोह सामान निकाल रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू



कुछ लम्हे टंगे है मेरे कमरे की दीवार पर
वक़्त की धूल सी जम गई है उन पर
उन्हे उतार रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू



थोड़ी सी खताए रखी है अलमारी के ऊपर
सजाए पता नहीं कब तक आयेगी
एक ज़माने से इंतजार कर रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू

आदते भी अजीब होती है

आदते भी अजीब होती है

तुम्हारी आदत
चूडिया पहनना
फिर बिना वज़ह उन्हे तोड़ देना
मेरी आदत यह कहना
चूडिया पहनती क्यों हो
अगर तोडनी ही है तो
आदते भी अजीब होती है....
............

समंदर किनारे रेत पर
कभी कभी बैठ जाता हु

सूरज समंदर के उस पर डूबता है
में इस पर तुम्हारे ख्यालो में डूब जाता हु
फर्क सिर्फ इतना है की तुम साथ नहीं होती
आदते भी अजीब होती है....
.............

ऑफिस से निकलता हु किसे काम के लिए
मेरे पैर मुझे अपने आप ही
तुम्हारे गली में ला खड़ा कर देते है
आदते भी अजीब होती है....
.............

मेरी गली में वोह खट्टे बेर वाला
अब भी आ जाता है
में फ़क़त उसे अब भी आवाज़ दे देता हु
पर बेर तो में खाता ही नहीं
आदते भी अजीब होती है....
.............

आज फिर होली का त्योंहार आया
कितनी शरारत करती थी तुम होली के दिन
सुबह सुबह मेरे गालो पर रंग लगा दिया कर देती थी तुम
जब से तुम गई हो ज़िन्दगी के सारे रंग
चले गए है तुम्हारे साथ
आदते भी अजीब होती है....
.............

जब हम पहली बार ऊटी गए थे
तुमने मेरे लिए जो एक घडी खरीदी थी
वोह आज भी अपने वक़्त पर पहरा दे रही है
मेरे दिल आज भी अपने पहरे पर मुस्तैद है
आदते भी अजीब होती है....
.............


में अब भी कार की चाबी जेब में रख कर भूल जाता हु
और पूरे घर में तलाश करता रहता हु
किसे काम से जेब में हाथ डालता हु तो वोह मिल जाती है
और फिर जोर से हंसता हु
पर अब तुम साथ नहीं होती हो
हसी गायब हो जाती है
आदते भी अजीब होती है....
.............

तुम्हारे जाने के बाद
कई दिनों तक बिस्तर ठीक नहीं किया मैंने
तुम्हारी तरफ की चादर में जो सिलवट पड़ी है
औन्धै मुह पड़ा रहता हु सारा दिन उसमे
आदते भी अजीब होती है....
.............

तुम्हारे आवाज़ की आदत सी हो गई है मुझे
जीने के लिए कुछ सांसे कम लगती है तो
टेप रेकॉर्डर में टेप की हुई तुम्हारी आवाज़
कानो में उतार लेता हु
आदते भी अजीब होती है....
.............

गिल्हेरिया अब भी आ जाती है
आँगन में नल के चबूतरे पर
मटर के दाने खाने के लिए
रोज़ खिलाता हु में उन्हे मगर
शक की निगाह से देखती है मुझे बहुत
वोह तुम्हारे हाथो का मज़ा खूब पहचानती होंगी
आदते भी अजीब होती है....
.............

इतेफाक

बरसों के बाद देखा इक शख्स दिलरुबा सा
अभी जहन में नहीं है पर नाम था भला सा

अबरू
खिंचे खिंचे से आखें झुकी झुकी सी
बातें रुकी रुकी सी लहज़ा थका थका सा

अलफाज़ थे के जुगनु आवाज़ के सफ़र में

बन जाये जंगलों में जिस तरह रास्ता सा


ख़्वाबों में ख़्वाब उसके यादों में याद उसकी
नींदों में घुल गया हो जैसे के रतजगा सा

पहले भी लोग आये कितने ही ज़िंदगी में
वो हर तरह से लेकिन औरों से था जुदा सा

अगली मुहब्बत्तों ने वो नामुरादियाँ दीं
ताज़ा रफाक़तों से दिल था डरा डरा सा

कुछ ये के मुद्द्तों से हम भी नहीं थे रोये
कुछ ज़हर में बुझा था अहबाब का दिलासा

फिर यूं हुआ के सावन आंखो में आ बसे थे
फिर यूं हुआ के जैसे दिल भी था आबला सा

अब सच कहें तो यारों हम को खबर नहीं थी
बन जायेगा क़यामत इक वाक़या ज़रा सा

तेवर थे बेरूखी के अंदाज़ दोस्ती के
वो अजनबी था लेकिन लगता था आशना सा

हम दश्त थे के दरिया, हम ज़हर थे के अमृत
नाहक था ज़ोनुम हम को जब वो नहीं था प्यासा

हम ने भी उसको देखा कल शाम इत्तेफाक़न
अपना भी हाल है अब लोगों 'फराज़' का सा

29 Aug 2011

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता,
इस का मतलब ये नहीं की मैं तुझे से प्यार नहीं करता..

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
बस तेरी सोच में वक़्त अब अपना बर्बाद नहीं करता...
...
तमाशा न बन जाये कहीं मुहब्बत मेरी,
इस लिए बस अपने दर्द का इज़हार नहीं करता...

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं अब,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता..

पर कोई तो बात है तेरी "फितरत" में ज़ालिम,
वरना मैं तुझे चाहने की खता बार-बार नहीं करता...

14 Aug 2011

अशआर अहमद फ़राज़

एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है 'फ़राज़'
सुन के मेरे मरने की ख़बर वो रोया क्यों था


इतना तसलसुल तो मेरी साँसों में भी नहीं 'फ़राज़'
जिस रवानी से वो शख्स मुझे याद आता है


मुझ से हर बार नज़रें चुरा लेता है वो 'फ़राज़'
मैंने कागज़ पर भी बना के देखी हैं आँखें उसकी


तुम तक़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
[ इखलास = सच्चाई ]


कुछ अपने मुक़द्दर में अँधेरे थे 'फ़राज़'
कुछ उसकी याद में दिए बुझा कर रोना अच्छा लगा

बहुत अजीब हैं बंदिशें मोहब्बत की 'फ़राज़'
न उसे क़ैद में रखा न हम फरार हुए


बड़ी मुश्किल से कल रात मैंने सुलाया खुद को
इन आँखों को तेरे ख़्वाब का लालच दे कर


ये वफ़ा तो उन दिनों की बात है 'फ़राज़'
जब मकां कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे


लाख़ ये चाह की उस को भूल जाऊं 'फ़राज़'
हौसला अपनी जगह, बेबसी अपनी जगह


कौन तौलेगा अब हीरों में मेरे आँसूं 'फ़राज़'
वो जो दर्द का ताजिर था दूकान छोड़ गया
[ ताजिर = व्यापारी ]


मेरे सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए


अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं


आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिये
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद


मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते


अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला भी है तुम्हे
हज़ार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां


जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम
सुना है 'फ़राज़' कल रात एहसास-ए-तन्हाई से मर गया


सारा शहर उसके जनाज़े में था शरीक
मर गया जो शक्स तनहाईयों के खौफ़ से


'फ़राज़' ग़म भी मिलते हैं नसीब वालों को
हर एक के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाने आते हैं


तुझको ये दुःख है कि मेरी चारागरी कैसे हो
मुझे ये गम है कि मेरे ज़ख्म भर न जाएँ कहीं
[ चारागरी = इलाज ]



इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार मैंने उससे बेवफाई की
[ मुसलसल = निरंतर,लगातार ]

वरना अब तलक यूँ था ख्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या फिर गज़लसराई की

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की
[ आशना = दोस्ती ]

हो चला था जब मुझे इख्तिलाफ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की
[ इख्तिलाफ = असहमति ]

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर है नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की
[ नासेह = सलाहकार ]

फिर क़फ़स में शोर उठा कैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर खबर रिहाई की
[ क़फ़स = जेल ] [ सय्याद = Hunter हंटर]

मेरे
सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए

अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं

आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिए
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद

मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते

13 Aug 2011

जाने क्यों शिक़स्त का अज़ाब लिए फिरता हूँ

जाने क्यों शिक़स्त का अज़ाब लिए फिरता हूँ
मैं क्या हूँ और क्या ख्वाब लिए फिरता हूँ

उसने एक बार किया था सवाल-ए-मोहब्बत
मैं हर लम्हा वफ़ा का जवाब लिए फिरता हूँ

उसने पूछा कब से नही सोए
मैं तब से रत-जगों का हिसाब लिए फिरता हूँ

उसकी ख्वाहिश थी के मेरी आँखों में पानी देखे
मैं उस वक़्त से आंसुओं का सैलाब लिए फिरता हूँ

अफ़सोस के फिर भी वो मेरी ना हुई "फ़राज़"
मैं जिस की आरज़ुओं की किताब लिए फिरता हूँ .

--अहमद फ़राज़

6 Aug 2011

अशआर

बिछड़ते वक़्त उसने कहा था न सवाल करना ,
न जवाब मिलेगा मुझे भूल जाना करार मिलेगा हम उस मुकाम पर थे …
न सवाल किया न जवाब मिला न भूल सके न करार मिला

एक अरसे बाद मिले तो मेरा नाम पूछ लिया
उसने बिछड़ते वक़्त जिसने कहा था तुम्हारी बहुत याद आएगी
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