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11 Apr 2013

होटों पर हँसी

कभी होती थी तनहाइयों में भी मेरे होटों पर हँसी,
आज महफिलों में भी मुझे दर्द-ऐ-दिल हुआ करता है.
मेरे जीने की आरजू करते थे मेरे दुश्मन भी कभी,
आज मेरा हमदर्द भी मेरी रुक्सती की दुआ करता है.

समझता था ख़ुद को खुशनसीब जिसे मेरे दिल में पनाह मिलती थी,
आज अश्क भी मेरी आंखों में ख़ुद को यतीम समझता है.
खूबसूरत होता था हर वो कलाम जो मैं कलम से लिकता था,
आज लहू से लिखा "एहसास" भी ख़ुद को अल्फाज़ समझता है.

कभी जीता था मेरा कातिल भी मेरी आशिकुई की उम्मीद में,
आज मेरा दिल भी मेरी ज़िन्दगी के लिए कहाँ धड़कता है.
क्या होती है बेवफाई ये तो कभी मालूम न था,
आज ज़र्रा ज़र्रा मेरा मोहब्बत के लिए तड़पता है.

16 Mar 2013

आदते

तुमको क्या चाह हमारी सारी चाहते बदल गयी!!

अच्छी थी या बुरी पता नहीं  सारी आदते बदल गयी!!

क्या सोचा था की चाहेंगे किसी को अपने से ज्यादा!!

जो मशहूर थी हमारे लिए वो सारी  कहावते  बदल गयी!!

29 Oct 2012

किताबो के पन्ने पलट के सोचते है

किताबो के पन्ने पलट के सोचते है ,
यूँ पलट जाये जिन्दगी तो क्या बात है,
तम्मना जो पूरी हो खवाबो में ,
हकीकत बन जाये तो क्या बात है
कुछ लोग मतलब के लिए ढूंढते है मुझे
बिन मतलब कोई आये तो क्या बात है ,
कतल करके तो सब ले जाएँगे दिल मेरा ,
कोई बातों से ले जाये तो क्या बात है ,
जो शरीफों की शराफत में बात न हो ,
एक शराबी कह जाए तो क्या बात है ,
जिन्दा रहने तक तो ख़ुशी दूंगा सबको ,
किसी को मेरी मौत पे ख़ुशी मिल जाये तो क्या बात है

26 Jul 2012

अहद

ता फिर न इन्तज़ार में नींद आये उम्र भर
आने का अहद कर गये आये जो ख़्वाब में

मैनें एहद किया था न उस से मिलूंगा मैं
वो रेत पे लकीर थी पत्थर पे नहीं थी ।

ग़म तो ये है कि वो अहदे वफ़ा टूट गया
बेवफ़ा कोई भी हो तुम न सही हम ही सही (राही मासूम रज़ा)


कहा था किसने के अहद-ए-वफ़ा करो उससे
जो यूँ किया है तो फिर क्यूँ गिला करो उससे (अहमद फ़राज़)

अह्द-ए-जवानी रो-रो काटा, पीरी में लीं आँखें मूँद
यानि रात बहोत थे जागे सुबह हुई आराम किया (मीर तक़ी 'मीर')

तुम्हारे अह्द-ए-वफ़ा को अहद मैं क्या समझूं
मुझे ख़ुद अपनी मोहब्बत का ऐतबार नहीं (साहिर लुधियानवी)

ऐ ज़िन्दगी एक अह्द मांगता हूँ तुझसे
फ़िर ये ही खेल हो तो मेरे साथ ना हो 

वो जब से उम्र कि बदरिया सफ़ेद हो गयी
एहदे वफ़ा तो छोड़ो मुस्कुराता नहीं कोई


और क्या अहदे वफ़ा होते हैं
लोग मिलते हैं,जुदा होते हैं


हमें किसी की अहदे वफ़ा का इल्म नहीं
हम और हमारी महफ़िल बरक़रार रहे

निभानी नहीं आती उसे रस्म अहद वफा की ,
टूटती हैं चूडियाँ हर दिन बेवफाई से



अहद का अर्थ है:
१ प्रतिज्ञा या वचन ।
२ काल या युग ( अहद-ए-संग= प्रस्तर युग)
३ राज्य या सत्ता

3 Dec 2011

तो क्या बात हो

किताबों के पन्ने पलट कर सोचते हैं,
यूँ ही पलट जाये जिंदगी तो क्या बात हो |
तमन्ना जो पूरी हो ख्वावों में,
हकीक़त बन जाये तो क्या बात हो |

कुछ लोग मतलब के लिए ढूंढते हैं मुझे,
बिन मतलब कोई आये तो क्या बात हो |
क़तल करके तो सब ले जायेंगे दिल मेरा,
कोई बातों से ले जाये तो क्या बात हो |
जो शरीफों की शराफत में  बात न हो,
एक शराबी कह जाये तो क्या बात हो |
जिंदा रहने तक तो ख़ुशी दूँगा सबको,
किसी को मेरी मौत से ख़ुशी मिल जाये तो क्या बात हो

2 Dec 2011

भीग गया पैराहन

भीग गया पैराहन तमाम, दोस्तों के आंसू पोंछने में!
क्यूँ कोई कन्धा हमें रोने के लिए नसीब ना हुआ?
नज़दीक तो आये कई हमसफ़र ज़िंदगी में,
किस्मत है अपनी ऐसी के कोई 'करीब' ना हुआ!

9 Oct 2011

फिर एक नयी चिता जला रहा हू

फिर एक नयी चिता जला रहा हू

जिस्म सीली लकड़ी जैसे सुलग रहा है
अपनी जली रूह की राख उड़ा कर
रुख हवाओ का दिखा रहा हू

फिर एक नयी चिता जला रहा हू



आज कुछ खुवाब बोए है कागज़ पर
कोशिश है नज्मो को बा - तरतीब करने की
किये जा रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू


कुछ रह गया जो साथ न गया तुम्हारे
दिल की दराजों को फिर से खंगाल कर
आज वोह सामान निकाल रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू



कुछ लम्हे टंगे है मेरे कमरे की दीवार पर
वक़्त की धूल सी जम गई है उन पर
उन्हे उतार रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू



थोड़ी सी खताए रखी है अलमारी के ऊपर
सजाए पता नहीं कब तक आयेगी
एक ज़माने से इंतजार कर रहा हू


फिर एक नयी चिता जला रहा हू

आदते भी अजीब होती है

आदते भी अजीब होती है

तुम्हारी आदत
चूडिया पहनना
फिर बिना वज़ह उन्हे तोड़ देना
मेरी आदत यह कहना
चूडिया पहनती क्यों हो
अगर तोडनी ही है तो
आदते भी अजीब होती है....
............

समंदर किनारे रेत पर
कभी कभी बैठ जाता हु

सूरज समंदर के उस पर डूबता है
में इस पर तुम्हारे ख्यालो में डूब जाता हु
फर्क सिर्फ इतना है की तुम साथ नहीं होती
आदते भी अजीब होती है....
.............

ऑफिस से निकलता हु किसे काम के लिए
मेरे पैर मुझे अपने आप ही
तुम्हारे गली में ला खड़ा कर देते है
आदते भी अजीब होती है....
.............

मेरी गली में वोह खट्टे बेर वाला
अब भी आ जाता है
में फ़क़त उसे अब भी आवाज़ दे देता हु
पर बेर तो में खाता ही नहीं
आदते भी अजीब होती है....
.............

आज फिर होली का त्योंहार आया
कितनी शरारत करती थी तुम होली के दिन
सुबह सुबह मेरे गालो पर रंग लगा दिया कर देती थी तुम
जब से तुम गई हो ज़िन्दगी के सारे रंग
चले गए है तुम्हारे साथ
आदते भी अजीब होती है....
.............

जब हम पहली बार ऊटी गए थे
तुमने मेरे लिए जो एक घडी खरीदी थी
वोह आज भी अपने वक़्त पर पहरा दे रही है
मेरे दिल आज भी अपने पहरे पर मुस्तैद है
आदते भी अजीब होती है....
.............


में अब भी कार की चाबी जेब में रख कर भूल जाता हु
और पूरे घर में तलाश करता रहता हु
किसे काम से जेब में हाथ डालता हु तो वोह मिल जाती है
और फिर जोर से हंसता हु
पर अब तुम साथ नहीं होती हो
हसी गायब हो जाती है
आदते भी अजीब होती है....
.............

तुम्हारे जाने के बाद
कई दिनों तक बिस्तर ठीक नहीं किया मैंने
तुम्हारी तरफ की चादर में जो सिलवट पड़ी है
औन्धै मुह पड़ा रहता हु सारा दिन उसमे
आदते भी अजीब होती है....
.............

तुम्हारे आवाज़ की आदत सी हो गई है मुझे
जीने के लिए कुछ सांसे कम लगती है तो
टेप रेकॉर्डर में टेप की हुई तुम्हारी आवाज़
कानो में उतार लेता हु
आदते भी अजीब होती है....
.............

गिल्हेरिया अब भी आ जाती है
आँगन में नल के चबूतरे पर
मटर के दाने खाने के लिए
रोज़ खिलाता हु में उन्हे मगर
शक की निगाह से देखती है मुझे बहुत
वोह तुम्हारे हाथो का मज़ा खूब पहचानती होंगी
आदते भी अजीब होती है....
.............

29 Aug 2011

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता,
इस का मतलब ये नहीं की मैं तुझे से प्यार नहीं करता..

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
बस तेरी सोच में वक़्त अब अपना बर्बाद नहीं करता...
...
तमाशा न बन जाये कहीं मुहब्बत मेरी,
इस लिए बस अपने दर्द का इज़हार नहीं करता...

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं अब,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता..

पर कोई तो बात है तेरी "फितरत" में ज़ालिम,
वरना मैं तुझे चाहने की खता बार-बार नहीं करता...

6 Aug 2011

अशआर

बिछड़ते वक़्त उसने कहा था न सवाल करना ,
न जवाब मिलेगा मुझे भूल जाना करार मिलेगा हम उस मुकाम पर थे …
न सवाल किया न जवाब मिला न भूल सके न करार मिला

एक अरसे बाद मिले तो मेरा नाम पूछ लिया
उसने बिछड़ते वक़्त जिसने कहा था तुम्हारी बहुत याद आएगी

18 Jul 2011

बिखरे मोती

1)वो आएगी घर पर मेरे सुन कर मौत की खबर मेरी
यारो ज़रा कफन हटा देना
कम से कम दीदार तो होगा
मय्यत को मेरी देख के अगर रो दे तो उठा देना
अगर खामोश रहे तो चेहरा छुपा देना

हमसे अगर वो करती है मोहब्बत तो इजहार वो करेगी
अगर न करे इजहार तो ज़ालिम को धक्के मार के घर निकाल देना

2)बहुत चाह मगर उन्हें भुला न सके,
खयालों में किसी और को ला न सके.

उनको देख के आँसू तो पोंछ लिए,
पर किसी और को देख के मुस्कुरा न सके.


3)खा कर फरेब और दगा जमाने में रह गये
हम दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने में रह गये
एक पल में दुनिया हमसे आगे निकल गई
हम दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गये

4)जिक्र इतना किया तेरा कि तू बेवफा हो गया
नाम इतना लिया तेरा कि खुदा भी खफा हो गया
मुमकिन नहीं अब तो कि पीछे लौट जाये हम
मानते है गुनाह था,पर जो हो गया सो हो गया

मुदतें हो गयी देखे तुझको,पर दिल पे तेरा ही साया है
आँखों में आज तलक वो मंजर समाया है
काश आसा होता इतना यादो को मिटा पाना
जैसे तेरा नाम रेत पे लिख-लिख के मिटाया है

5)आशक़ी सब्रतलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ूने-जिगर होने तक ।
हमने माना, कि तग़ाफुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक ।

6)पीने लगे न खून भी आँसू के साथ-साथ
यों आदमी की प्यास को ज्यादा न दाबिए..

7)सोचा था, इक ग़ज़ल लिखेंगे तुझे याद किये बगैर
ग़ज़ल तो दूर की बात है , एक मतला नहीं लिख पाए

14 Jul 2011

तेरी यादों को सीने से लगाया तो आंसू निकले

उनकी तस्वीर को सीने से लगा लेते है,
इस तरह जुदाई का गम मिटा लेते है,
किसी तरह ज़िक्र हो जाये उनका,
तो हंस कर भीगी पलकें झुका लेते है.


तेरी यादों को सीने से लगाया तो आंसू निकले ,

इस तरह से दिल को बहलाया तो आंसू निकले ,

तेरी महफ़िल तेरे जलवे तेरी बातों का हुनर ,

जब किसी ने आकर सुनाया तो आंसू निकले ,

एक जज्बा था तुम्हे पाने की खवाहिश थी ,

तुमने जब हमको भुलाया तो आंसू निकले ,

तुम हमें कहते थे चश्मे नूर हो मेरे ,

जब हमें आँखों से गिराया तो आंसू निकले ,

दर्द-ए-दिल की कहानी

दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खुब लिखता है


कही पर बेवफा तो कही मुझे मेहबूब लिखता है

कुछ तो रस्म-ए-वफा निभा रहा है वो

हर एक सफ-ए-कहानी मे वो मुझे मजमून लिखता है

लफ्ज़ो की जुस्तजू मेरे संग़ बीते लम्हो से लेता है

स्याही मेरे अश्क़ को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है

कशिश क्यो ना हो उसकी दास्तान-ए-दर्द मे यारो

जब भी ज़िक्र खुद का आता है वो खुद को वफा लिखता है

तहरीरे झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर

खुद को दर्द की मिसाल और कही मजबूर लिखता है


मजमून=जिसपर कुछ कहा या लिखा जाय

4 Jun 2011

फितरत बदलती जिंदगी

मत देख कि कोई शख्श गुनाहगार कितना है.


यह देख कि तेरे साथ वफादार कितना है.

ये मत सोच कि उसे कुछ लोगों से नफ़रत भी है.

यह देख कि उसको तुझसे प्यार कितना है.


मत देख कि वो तनहा क्यूँ बैठता है इतना.


ये देख कि उसे तेरा इन्तिज़ार कितना है.


ये मत पूछ उसको तुझसे प्यार कितना है.


उसको ये बता कि वो तेरा हक़दार कितना है.

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हर मुश्किल इम्तिहान नहीं होती.


मोहब्बत खामोश रहती है, बेजुबान नहीं होती.


एक एक कदम पर फितरत बदलती है जिंदगी.


जब हमको मंजिलों की पहचान नहीं होती.

मै खुद को फरिश्ता नही कहता

दरिया तो है वो, जिस से किनारे छलक उठाये
बहते हुए पानी को मै दरिया नही कहता
गहराई जो दी तुने मेरे ज़ख्म ए जिगर को
मै इतना समुंद्र को भी गहरा नही कहता
किस किस की तम्मना मे करू प्यार को तक़सीम
हर शक़स को मै जान ए तम्मना नही कहता
करता हूँ मै, अपने गुनाहो पे बहुत नाज़
इंसान हूँ मै खुद को फरिश्ता नही कहता

हम जवाब क्या देते

पत्थर की है दुनियाँ जज़्बात नही समझती
दिल मे क्या है वो बात नही समझती
तन्हा तो चाँद भी है सितारो के बीच
मगर चाँद का दर्द बेवफा रात नही समझती
हम दर्द झेलने से नही डरते
पर उस दर्द के खत्म होने की कोई आस तो हो
दर्द चाहे कितना भी दर्दनाक हो
पर दर्द देने वाले को उसका एहसास तो हो
उनको अपने हाल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे गलत थे हम जवाब क्या देते
वो तो लफ्ज़ो की हिफाज़त भी ना कर सके
फिर उनके हाथ मे ज़िन्दगी की पुरी किताब क्या देते

रस्म-ए-वफा

दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खुब लिखता है


कही पर बेवफा तो कही मुझे मेहबूब लिखता है

कुछ तो रस्म-ए-वफा निभा रहा है वो

हर एक सफ-ए-कहानी मे वो मुझे मजमून लिखता है

लफ्ज़ो की जुस्तजू मेरे संग़ बीते लम्हो से लेता है

स्याही मेरे अश्क़ को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है

कशिश क्यो ना हो उसकी दास्तान-ए-दर्द मे यारो

जब भी ज़िक्र खुद का आता है वो खुद को वफा लिखता है

तहरीरे झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर

खुद को दर्द की मिसाल और कही मजबूर लिखता है

22 Dec 2010

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं

मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं

माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं


कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर

ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं


सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें

तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं


चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन

क्या ज़ुरूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं


बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं

शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं


शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती

मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं

20 Dec 2010

बिखरे मोती

"वो मुझसे दूर रह कर खुश है, तो उसे खुश रहने दो
मुझ से मिल कर उसका उदास होना, मुझे अच्छा नहीं लगता

"हमको बहुत नाज़ था अपनी हँसी पर, खून के आंसू रुलाया ज़िन्दगी ने"


"उसे ये शिकवा के मैं उसे समझ न सका
और मुझे ये नाज़ के मैं जानता बस उसको था "

"थक सा गया है मेरी चाहतों का वजूद,
अब कोई अच्छा भी लगे तो हम इज़हार नहीं करते"
- अज्ञात

"मुझको हँसते हुए इस दुनिया से रुखसत कीजे, कोई रोता है भला जब कोई घर जाता है - मुनव्वर राना"


"एक वो जो मोहब्बत का सिला देता है
ये ज़माना ही वफाओं की सज़ा देता है
वो भी आंसू है जो आग बुझाए दिल की
ये भी आंसू जो दामन जो जला देता है"


"मै मुद्दतों जिया हू किसी दोस्त के बग़ैर
अब तुम भी साथ छोडने को कह रहे हो ख़ैर्..."

"इस बात का रोना नही क्यू तुमने किया दिल बर्बाद किया
इसका गम है के बहुत देर में बर्बाद किया....."

"अब ये भी नही ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं...

"मैंने तो उस रात से आँखे ही नही खोली जिस रात उसने कहा था के सुबह होते ही भूल जाना मुझे ...

"तुम अगर बिखर जाओ
बेबसी में घिर जाओ
दिल से एक सदा देना
बस मुझे बुला लेना,
मैं तुम्हे संभल लूँगा

"ज़िन्दगी में चलने का ,रास्ता बदलने का
एक हुनर सिखा दूंगा
तुम को होसला दूंगा
और जब संभल जाओ
रौशनी में ढल जाओ
मुझ को ये सिला देना
"तुम मुझे भुला देना"


"वो इस अदा से झूठ कहा करती है
कि उसकी हर बात सच लगा करती है
मुझे मालूम है वो नाजनीन बेवफा है
एक तरफ़ा मोहब्बत यु ही हुआ करती है


"काश पास हमारे भी तुमसे तरीके होते
हमारी बातों में भी तुम्हारे से सलीके होते
तुम्हे पाकर भी तुम्हे शायद पा सकता
प्यार के कायदे भी कभी जो हमने सीखे होते


"कांच से कलाई पे मेरा नाम लिखती रही
मेरे नाम से सुर्ख लकीरें निकलती रही
मोहब्बत इतनी थी उसे मेरे नाम से
अपने ही हाथो से मोम सी वो पिघलती रही"
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