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5 Aug 2013

अशआर, Ashaar

कोई पूछ रहा है मुझसे मेरी ज़िन्दगी की कीमत
मुझे याद आ रहा है तेरा वो हल्का सा मुस्कुराना


मुझ पर सितम ढा गये मेरी ग़ज़ल के शेर,
पढ़ पढ़ के खो रहे हैं वो किसी और के ख्याल में
--मरीज़

कमबख्त मानता ही नहीं दिल उसे भूलने को
मैं हाथ जोड़ता हूँ तो ये पांव पड़ जाता है

--अज्ञात 

वही ज़बान, वही बातें मगर है कितना फरक
तेरे नाम से पहले और तेरे नाम के बाद
--अज्ञात


कितना इख्तियार था उसको अपनी इस चाहत पे "अजनबी"
इस लिए जब चाहा याद किया, जब चाहा भुला दिया

--अजनबी एक गुमनाम शायर 


दिल लगी में वक़्त-ए -तन्हाई ऐसा भी आता है
कि रात चली जाती है मगर अँधेरे नहीं जाते

--अज्ञात

जाते हुए उसने सिर्फ इतना कहा था मुझसे
ओ पागल ... अपनी ज़िंदगी जी लेना, वैसे प्यार अच्छा करते हो

--अज्ञात 

27 Apr 2013

ashar

1.kash k wo lout aaye mujh se ye kehne
k tum kon hote ho mujh se bicharne wale

2.zakham khareed laya hoon bazar-e-dard se
dil zid kar raha tha mujhe mohabbat chahiye

3.Suna Hai Ishq Se Teri Bohat Banti Hai
Ek Ehsan Kar Us Say  Pooch Qasoor  Mera

4. Dekhta Hoon Tasveer-e-Yaar To Aata Hai Rashk
Her Baat La-Jawaab Thi Agar Bewafa Na Hota

5. Wo Kehta Hai Bata Tera Dard Kaise Samjhoon
Main ne Kaha Ishq Kar Bohat Kar Aur Kar K Haar Jaa

6Chod ye baat milay zakham kahan se mujhko
Zindagi itna bata kitna safar baqi hai

7Aaj usne aik aur dard dia to yaad aaya
Humne bhi to duaaon mein uske dard maangay thay
 

11 Apr 2013

अशआर


1.      वहां  से  एक  पानी  की  बूँद    निकल  सकी  ,
तमाम  उम्र  जिन  आँखों  को  हम  झील  लिखते  रहे

2.      कल  मिला  वक़्त  तो  जुल्फें  तेरी  सुलझाउंगा  , आज  उलझा  हूँ  ज़रा  वक़्त  को  सुलझाने  में ..!!

3.      वो  कहते   हैं  की  अगर  नसीब  होगा  मेरा  तो  हम  उन्हें  ज़रूर  पाएंगे ,
हम  पूछते  हैं  उनसे  अगर  हम  बदनसीब  हुए  तो .. उनके  बिना  कैसे  जी  पाएंगे

4.      मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर आईने मेरे क़द के बराबर नही मिले

5.      मैं उसका हो नहीं सकता बता न देना उसे, सुनेगा तो लकीरें हाथ की अपनी वो सब जला लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊं उस से रिश्ता मैं जानता हूँ वो जब चाहेगा बुला लेगा !!!!

6.      दुनिया  में  और  भी  वजह  होती  है  दिल  के  टूट  जाने  की
लोग  युही  मोहब्बत  को  बदनाम  किया  करते  है  !!

7.      वो  एक  ख़त , जो  उस  ने  कभी  लिखा  ही  नहीं
में  रोज्ज़  बैठ  कर  , उस  का  जवाब  लिखता  हूँ ..

8.      मुझ  से  कहती  है  तेरे  साथ  रहूँगी  सदा 
बहोत  प्यार   करती  है  मुझसे  उदासी  मेरी

9.      कोई  तो  मोल  लगाए  मेरी  हस्ती  का  
किसी  की  आँख  के  आंसू  खरीदने  हैं  मुझे


10.  जान  दे  देंगे  ये  हमारे  बस  मैं  है ,
हम  नहीं  करते  बात  सितारे  तोड़  लाने  की


11.  मैं  बद -दुआ  तो  नहीं  देता   उसको   मगर दुआ  यही  है  ,उसे  मुझ  सा    मिले  कोई 



12.  मुलाकाते  जरूरी  है  अगर  रिश्ते  बचाने  है ,
लगा  कर  भूल  जाने  से  तो  पौधे  भी  सुख  जाते  है

13.  तेज़  रफ़्तार  ज़िन्दगी  का  ये  आलम  है  के ,
 सुबह  के  गम  शाम  को  पुराने  हो  जाते  हैं

14.  कुछ इसलिये भी तुम से मोहब्बत है
मेरा तो कोई नहीं है तुम्हारा तो कोई हो

15.  मैं चाहता हूँ फिर से वो दिन पलट आयें
कि माँ के चुल्लू को मेरा गिलास होना पड़े

16.  माँ के सामने कभी खुलकर नहीं रोना,
जहाँ बुनियाद हो, इतनी नमी अच्छी नहीं होती

17.  आंखें हैं कि उन्हें घर से निकलने नहीं देती
आंसू हैं कि सामान-ए-सफर बांधे हुए हैं

12 Apr 2012

अशआर

हर ज़ख्म नया पुराने ज़ख्मों की गिनती घटा देता है
जाने मुझे कब रखना उनके सितम का हिसाब आएगा

--अज्ञात

हमारा तजकिरा छोडो, हम ऐसे लोग हैं जिन को
मोहब्बत कुछ नहीं कहती, वफायें मार जाती हैं

--अज्ञात

लोग सीने में कैद रखते हैं
हमने सर पर चढ़ा लिया दिल को

--अज्ञात

दियो का कद घटाने के लिए रातें बड़ी करना ,
बड़े शेहरो में रहना हो तो बातें बड़ी करना
मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सबको नहीं आता ,
किसी को छोड़ना हो तो मुलाकातें बड़ी करना

--अज्ञात


अभी मसरूफ हूँ काफी, कभी फुरसत में सोचूंगा
के तुझको याद करने में, मैं क्या क्या भूल जाता हूँ

--अज्ञात 

14 Aug 2011

अशआर अहमद फ़राज़

एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है 'फ़राज़'
सुन के मेरे मरने की ख़बर वो रोया क्यों था


इतना तसलसुल तो मेरी साँसों में भी नहीं 'फ़राज़'
जिस रवानी से वो शख्स मुझे याद आता है


मुझ से हर बार नज़रें चुरा लेता है वो 'फ़राज़'
मैंने कागज़ पर भी बना के देखी हैं आँखें उसकी


तुम तक़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
[ इखलास = सच्चाई ]


कुछ अपने मुक़द्दर में अँधेरे थे 'फ़राज़'
कुछ उसकी याद में दिए बुझा कर रोना अच्छा लगा

बहुत अजीब हैं बंदिशें मोहब्बत की 'फ़राज़'
न उसे क़ैद में रखा न हम फरार हुए


बड़ी मुश्किल से कल रात मैंने सुलाया खुद को
इन आँखों को तेरे ख़्वाब का लालच दे कर


ये वफ़ा तो उन दिनों की बात है 'फ़राज़'
जब मकां कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे


लाख़ ये चाह की उस को भूल जाऊं 'फ़राज़'
हौसला अपनी जगह, बेबसी अपनी जगह


कौन तौलेगा अब हीरों में मेरे आँसूं 'फ़राज़'
वो जो दर्द का ताजिर था दूकान छोड़ गया
[ ताजिर = व्यापारी ]


मेरे सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए


अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं


आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिये
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद


मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते


अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला भी है तुम्हे
हज़ार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां


जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम
सुना है 'फ़राज़' कल रात एहसास-ए-तन्हाई से मर गया


सारा शहर उसके जनाज़े में था शरीक
मर गया जो शक्स तनहाईयों के खौफ़ से


'फ़राज़' ग़म भी मिलते हैं नसीब वालों को
हर एक के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाने आते हैं


तुझको ये दुःख है कि मेरी चारागरी कैसे हो
मुझे ये गम है कि मेरे ज़ख्म भर न जाएँ कहीं
[ चारागरी = इलाज ]



इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार मैंने उससे बेवफाई की
[ मुसलसल = निरंतर,लगातार ]

वरना अब तलक यूँ था ख्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या फिर गज़लसराई की

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की
[ आशना = दोस्ती ]

हो चला था जब मुझे इख्तिलाफ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की
[ इख्तिलाफ = असहमति ]

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर है नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की
[ नासेह = सलाहकार ]

फिर क़फ़स में शोर उठा कैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर खबर रिहाई की
[ क़फ़स = जेल ] [ सय्याद = Hunter हंटर]

मेरे
सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए

अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं

आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिए
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद

मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते

6 Aug 2011

अशआर

बिछड़ते वक़्त उसने कहा था न सवाल करना ,
न जवाब मिलेगा मुझे भूल जाना करार मिलेगा हम उस मुकाम पर थे …
न सवाल किया न जवाब मिला न भूल सके न करार मिला

एक अरसे बाद मिले तो मेरा नाम पूछ लिया
उसने बिछड़ते वक़्त जिसने कहा था तुम्हारी बहुत याद आएगी

20 Dec 2010

अशआर

ज़िंदगी ग़रज़ कि काट दिये ज़िंदगी के दिन ऐ दोस्त,

वो तेरी याद में हों या तुझे भुलाने में।


–‘फ़िराक़’ गोरखपुरी


है ख़बर गर्म उनके आने की,
आज ही घर में बोरिया न हुआ।


-‘ग़ालिब’


दुनिया ने तजरबातो-हवादिस की शक्ल में,
जो कुछ मुझे दिया है, वो लौटा रहा हूँ मैं।


साहिर’ लुधियानवी


इस दौर में ज़िंदगी बशर की,
बीमार की रात हो गयी है।

-‘फ़िराक़’ गोरखपुरी।

जिसमें बचपन का मेरा क़िस्सा है,
उम्र का बेहतरीन हिस्सा है।

-‘जोश’ मलीहाबादी


मेरे चमन में कोई नशेमन नहीं रहा,
या यूं कहो कि बर्क़ की दहशत नहीं रही।


-दुष्यंत कुमार


कुछ ऐसे सिलसिले भी चले ज़िंदगी के साथ,
कड़ियां मिलीं जो उनकी तो ज़ंजीर बन गये।


-यूसुफ ‘बहजाद’

मौत से डर हौसला न हार,
ज़िंदगी को ढूँढ़ हादसात में।

अज़ीज़’ नहटौरी

मुख़ालफ़त से मेरी शख़्सियत संवरती है,
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतेराम करता हूँ।

-बशीर ‘बद्र’

कोई आज तक न समझा कि शबाब है तो क्या है,
यही उम्र जागने की, यही नींद का ज़माना।

-नुसुर वाहिदी

ज़माना बड़े शौक़ से सुन रहा था,
हमीं सो गये दास्तां कहते-कहते।

-‘साक़िब’ लखनवी

किस्मत की खूबी देखिए टूटी कहां कमंद,
दो-चार हाथ जब कि लबे-बाम रह गया।

-शेख़ क़यामउद्दीन ‘क़ायम’

तर दामनी पे शेख़ हमारी न जाइयो,
दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वज़ू करें।

-मीर ‘दर्द’

ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाले-यार होता,
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता।

गालिब’

कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।

ग़ालिब’


वो आये हैं पशेमां लाश पर अब,
तुझे अय ज़िंदगी लाऊं कहां से।

-‘मोमिन’

उम्र सारी तो कटी इश्के-बुतां में ‘मोमिन‘,
आख़री वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे।
-‘मोमिन’

लायी हयात आये, क़ज़ा ले चली चले,
अपनी ख़ुशी से आये, न अपनी ख़ुशी चले।

-‘ज़ौक़’

ऐ ‘ज़ौक़’ तकल्लुफ़ में है तकलीफ़ सरासर,
आराम से वो हैं जो तकल्लुफ़ नहीं करते।

-‘ज़ौक़’

रोशनी जिनसे हुई दुनिया में, उनकी क़ब्र पर,
आज तक इतना भी नहीं जाकर कोई रख दे चिराग़

-हाफ़िज


जब मैं चलूं तो साया भी अपना न साथ दे,
जब तुम चलो, ज़मीन चले, आस्मां चले।

-‘जलील’ मानकपुरी

हम तुम मिले न थे तो जुदाई का था मलाल,
अब ये मलाल है कि तमन्ना निकल गयी।

-‘जलील’ मानकपुरी

कोई दम का मेहमां हूं ऐ अहले-महफ़िल,
चिराग़े-सहर हूं, बुझा चाहता हूं।

-इक़बाल

ज़बां को बन्द करें या मुझे असीर करें,
मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते।

-‘चकबस्त’

आदत के बाद दर्द भी देने लगा है लुत्फ़,
हंस हंस के आह आह किये जा रहा हूं मैं।

-‘आरजू’ लखनवी

इन्हीं पत्थरों पे चलकर अगर आ सको तो आओ,
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है।

-मुस्तफ़ा ज़ैदी।

कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नये मिज़ाज़ का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो।

-बशीर ‘बद्र’

जी बहुत चाहता है सच बोलें,
क्या करें, हौसला नहीं होता।

-बशीर ‘बद्र’

मुझको उस वैद्य की विद्या पे तरस आता है,
भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।

-‘नीरज’

तनज़्ज़ुल की हद देखना चाहता हूं,
कि शायद वहीं हो तरक्की का जीना।

-अज्ञात

होता नहीं है कोई बुरे वक्त में शरीक,
पत्ते भी भागते हैं खिंजा में शजर से दूर।

-अज्ञात

ख़मोशी से मुसीबत और भी संगीन होती है,
तड़प ऐ दिल तड़पने से ज़रा तस्कीन होती है।

-अज्ञात

भलाई इसलिए चाही कि हों भले मशहूर,
ग़रज़ कि अपने ही मतलब के आश्ना थे हम।
-अज्ञात

बहुत कुछ पांव फैलाकर भी देखा ‘शाद’ दुनिया में,
मगर आख़िर जगह हमने न दो गज़ के सिवा पायी।

-‘शाद’ अज़ीमाबादी

ज़िन्दगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री ‘ग़ालिब’,
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।

-‘ग़ालिब’

जमा करते हो क्यों रकीबों को,
एक तमाशा हुआ गिला न हुआ।

-‘ग़ालिब’

हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन,
खाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक।

-‘ग़ालिब’

हम पर तिरी निगाह जो पहले थी अब नहीं,
सो भी न कुछ दिनों में रहे तो अजब नहीं।

-‘हसरत’ मोहानी

या रब ! तेरी रहमत से मायूस नहीं ‘फानी’,
लेकिन तेरी रहमत की ताख़ीर को क्या कहिए।

,
-‘फ़ानी’

तिनकों से खेलते ही रहे आशियां में हम,
आया भी और गया भी ज़माना बहार का।

-अज्ञात

किस तरफ जाऊं, किधर देखूं, किसे आवाज़ दूं ?
ऐ हुजूमे-नामुरादी जी बहुत घबराये है।
-अज्ञात

होशो-हवास, ताबो-तबां ‘दाग’ जा चुके,
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया।

-‘दाग’

मौत ही इंसान की दुश्मन नहीं,
ज़िंदगी भी जान लेकर जाएगी।

-‘जोश’ मलसियानी

‘सौदा’ की जो बाली पे गया शोरे-क़यामत,
खुद्दामे-अदब बोले-अभी आँख लगी है।

-‘सौदा’

न पूछो मुझसे गुलशन की हक़ीक़त,
बरस गुज़रे कि मैं हूं और क़फ़स है।

-अज्ञात

वो हैं अमीर, निज़ामे-जहां बनाते हैं,
मैं हूं फ़क़ीर मिज़ाज़े-जहां बदलता हूं।

-अज्ञात

अब इससे क्या ग़रज़ ये हरम है कि दैर है,
बैठे हैं हम तो साया-ए-दीवार देखकर।

-अज्ञात

ज़िंदगी से तो क्या शिकायत हो,
मौत ने भी भुला दिया है हमें।

;- अज्ञात

सिर्फ़ अफ़सुर्दा दिली को क्या कहें,
हमको जीने का हुनर आता न था।

- अज्ञात

जिस दिन से चला हूं मेरी मंजिल पे नज़र है,
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।

- अज्ञात

ज़िंदगी एक फ़क़ीर की चादर,
जब ढके पांव हमने, सर निकला।

- अज्ञात

हमराह चलो मेरे या राह से हट जाओ,
दीवार के रोके से दरिया कहीं रूकता है

- अज्ञात

सहारा मौत ने आकर दिया तो कब दिया हमको,
हमारी ज़िन्दगी जब दिन मुसीबत के गुज़ार आयी।

- अज्ञात

मौसमे-गुल में सितम हाय ख़िज़ां याद न कर,
चन्द घड़ियाँ हैं खुशी की, इन्हें बरबाद न कर।

- अज्ञात

बदशाहों की मोअत्तर ख़्वाब-गाहों में कहां ?
वो मज़ा जो भीगी-भीगी घास पर सोने में है।

- अज्ञात

जब डूब ही जाने का यक़ीं है तो न जाने,
ये लोग सफ़ीनों से उतर क्यों नहीं जाते।

-अमीर क़ज़लबाश

मुसीबत और लम्बी जिंदगानी,
बुजुर्गों की दुआ ने मार डाला।

मुज़्तर’ ख़ैराबादी

क्या देखता है हाथ मेरा छोड़ ऐ तबीब,
यां जान ही बदन में नहीं, नब्ज़ क्या चले।

-‘ज़ौक़’

दिल टूटने से थोड़ी सी तकलीफ़ तो हुई,
लेकिन तमाम उम्र को आराम हो गया।

-‘सफ़ी’ लखनवी

मैं जिसके हाथ में एक फूल दे के आया था,
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है।

-‘वसीम’ बरेलवी

मौत से बदतर बुढ़ापा आएगा,
जान से अच्छी जवानी जाएगी।

-‘दाग़’

बवक़्ते कत्ल मक़तल में कोई हमदम न था अपना,
निगाह कुछ देर तक लड़ती रही शमशीरे कातिल से।

-‘हफीज’ जालंधरी

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये थे लेकिन,
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले।

-‘ग़ालिब’

हो गया अब इश्क़ हम-आग़ोश तूफ़ान-ए-शबाब,
अक़्ल बैठी रह गयी साहिल पे शरमायी हुई।
-‘हफ़ीज़’ जालंधरी

ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिसमें,
हर घड़ी दर्द के पेबन्द लगे जाते हैं।
फ़ैज़’

लाग़िर हूं इस कदर मुझे पहचानती नहीं,
रह रह के देखती है क़ज़ा सर से पांव तक।

अमीर’ मीनाई

जनाज़े वालो, न चुपके क़दम बढ़ाये चलो,
उसी का कूचा है, टुक करते हाय-हाय चलो।

-‘सोज’

ग़ज़ल उसने छेड़ी मुझे साज़ देना,
ज़रा उम्रे-रफ़्ता को आवाज़ देना।

-‘सफ़ी’ लखनवी
सुबह को राजे-गुलो शबनम खुला,
हंसने वाले रात भर रोया किये।

-‘साकिब’ लखनवी

क़ैदे-हयात, बंदे-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं,
मौत से पहले आदमी गम से निजात पाये क्यों ?

-‘ग़ालिब’

मुट्ठियों में खाक़ लेकर दोस्त आये बवक़्ते-दफ़्न,
ज़िंदगी भर की मुहब्बत का सिला देने लगे।

-‘साक़िब’ लखनवी

नतीजा एक ही निकला कि थी क़िस्मत में नाकामी,
कभी कुछ कह के पछताये, कभी चुप रह के पछताये।
आरज़ू’ लखनवी

तेरे सवाल पर चुप है, इसे ग़नीमत जान,
कहीं जवाब न दे दे कि मैं नहीं सुनता।

-‘शाद’ अज़ीमाबादी

नातवां बीमारे-ग़म, उस पर थपेड़े मौत के,
बुझ गया आख़िर चिराग़े-सुबह लहराने के बाद।

-‘आरजू’ लखनवी

कुछ तो लतीफ होती घड़ियां मुसीबतों की,
तुम एक दिन तो मिलते, दो दिन की ज़िंदगी में।
-‘सागर’ निजामी

उम्रे-दराज मांग कर लाये थे चार दिन,
दो आरजू में कट गये, दो इंतज़ार में।

-‘जफर’

नींद भी मौत बन गयी है ‘अदम’,
बेवफ़ा रात भर नहीं आती।

-‘अदम’

मौत का एक दिन मौअय्यन है,
नींद क्यों रात भर नहीं आती।
-ग़ालिब

बहुत दूर तुझसे कभी मैं न था,
मगर दिन लगे थे सफर में बहुत।
-शहरयार

सीने में जलन, आंखों में तूफ़ान सा क्यों है,
इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यों है।
-शहरयार

क्या पूछता है तू मेरी बरबादियों का हाल,
थोड़ी सी खाक़ लेके हवा में उड़ा के देख।
-‘जलील’ मानिकपुरी

चला जाता हूं हंसता खेलता मौजे हवादिस से,
अगर आसानियां हों, ज़िंदगी दुश्वार हो जाए।
-‘असगर’ गोंडवी

मिली हवाओं में उड़ने की वो सज़ा यारो,
मैं जमीन के रिश्तों से कट गया यारो।
-‘वसीम’ बरेलवी

हर शख़्श दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ,
फिर ये भी चाहता है उसे रास्ता मिले।

-‘वसीम’ बरेलवी
जिनके आंगन में अमीरी का शजर लगता है,
उनका हर ऐब ज़माने को हुनर लगता है।
-अंजुम रहबर

सच बात मान लीजिए चेहरे पे धूल है,
इल्जाम आइनों पे लगाना फ़िज़ूल है।
-अंजुम रहबर

इसी फरेब में सदियां गुजार दीं हमने,
गुजिश्ता साल से शायद ये साल बेहतर हो।

-‘मेराज’ फैजाबादी

तुम गये तो कभी सहर न हुई,
रात ही आयी रोज रात के बाद।

-‘माजिद’ देवबदी

बे-सरो-सामां ही बेहतर कट रही है ज़िंदगी,
घर बना तो रोज़ घर लुटने का डर हो जाएगा।

-अरुण साहिबाबादी

ख़्वाब कैसे होते हैं, पूछते हो क्या उनसे,
भूख जिन गरीबों को रात भर सताती है।

-अरुण साहिबाबादी

साथ भी छोड़ा तो कब, जब सब बुरे दिन कटे गये,
ज़िंदगी तूने यहां आकर दिया धोखा मुझे।

-‘नातिक’ गुलावठी

वो ज़िंदगी के कड़े कोस याद आते हैं,
तेरी निगाहे-करम का घना-घना साया।

‘फ़िराक़’ गोरखपुरी

मकाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं,
जो कूए-यार से निकले तो सूए-दार चले।

‘फ़ैज़’

झोंपड़ी क़तरा-ए-शबनम को तरस जाती है,
जो घटा आती है महलों पे बरस जाती है।

- अज्ञात

जंगल में सांप, शहर में बसते हैं आदमी,
सांपों से बच के आये तो डसते हैं आदमी।

-
‘फ़ैज़’

शाम से ही बुझा सा रहता है,
दिल हुआ है चिराग़ मुफ़लिस का।

-‘मीर’

गोरी सोये सेज पर मुख पर डारे केस,
चल ‘खुसरो’ घर आपने भई रैन चहुं देस।

-अमीर ‘ख़ुसरो’





















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