यांदे संभाली है इस दिल में... सुना इस दुनिया में सब बिकता है... अफसोस मुझे इनका कोई का खरीददार न मिला
31 Mar 2011
कभी चढ़ तो कभी उतर जाएँ
लहर बन कर मगर किधर जाएँ
इसलिए भी कुरेदा करते हैं
ज़ख्म दिल के कहीं ये भर न जाएँ
दिया है ज़ख्म अब न देना दवा
टुकड़े दिल के न सब बिखर जाएँ
लौट आयें हैं हम तेरे दिल से
आप भी बस अब अपने घर जाए
कौन हमको मानाने आएगा
आप ही रूठ कर अगर जाएँ
दिल "सागर" से लगाये ही रखना
भूल से भी न वो सुधर जाएँ
सीने में ज़ख़्म
जो हमपे गुज़री गुज़रे चले गए
उम्र दराजी की दुआ मिली जब
दूर हमसे हमारे चले गए
वोह आएगा एक दिन मिलने हमसे
नाम उसका ही पुकारे चले गए
सर्द हवा का झोखा कुछ ऐसा चला
काफिला छोड़ बंजारे चले गए
कहाँ देखें वो रोशन चिराग "सागर"
मुद्दतें बीती वोह नज़ारे चले गए
1 Feb 2011
रिमझिम: ढेर सारा अँधेरा
हर सुबह तेरा ख्याल आता है
फिर भी हर शब तेरा चेहरा जगाता है
हर लम्हा तुझसे वाबस्ता है
हर सुबह तेरा ख्याल आता है
ये ज़िन्दगी रुक सी गयी है तेरे बिन
आईने अब भी तेरा अक्स दिखाता है
मेरे वजूद के हर पहलू में
आज तक तेरा साया झिलमिलाता है
न लौट कर आती है कभी उम्मीद मेरी
मगर दिल ना-मुक्कमल इंतज़ार कराता है
हर गोश में मेरे ख्वाब्गार के
सिर्फ तेरा सपना समाता है
कोई वादा नहीं किया कभी तूने, लेकिन
किसी यकीं पे अब भी वक़्त आस लगाता है
सद् कोशिशों के बावजूद जाने क्यों
भूल कर भी हर रोज़ तू याद आता है
फडफडाकर रखे हें
आसमां पर निगाहें जमा कर रखे हें ।
मिले जख्म जितने भी दिल को अभी तक ,
सीने से अपने लगा कर रखे हें ।
कहीं जल न जाए ये दामन वफ़ा का ,
दिये आंसुओं के बुझाकर रखे हें ।
खुदा जानता है मिरे दिल की हालत ,
कई राज जिसने छुपाकर रखे हें ।
ग़मों ने सताया ,रुलाया हमेशा ,
मगर मैंने रिश्ते बनाकर रखे हें ।
नजर लग न जाए कहीं इस जहां की ,
मुहब्बत के किस्से छुपाकर रखे हें
30 Jan 2011
कभी उनकी याद आती है कभी उनके ख्व़ाब आते हैं,
मुझे सताने के सलीके तो उन्हें बेहिसाब आते हैं।
कयामत देखनी हो गर चले जाना उस महफिल में,
सुना है उस महफिल में वो बेनकाब आते हैं।
कई सदियों में आती है कोई सूरत हसीं इतनी,
हुस्न पर हर रोज कहां ऐसे श़बाब आते हैं।
रौशनी के वास्ते तो उनका नूर ही काफी है,
उनके दीदार को आफ़ताब और माहताब आते हैं।
शख़्सियत
रूबरू होना है तो आगोश मैं आना होगा ।
यूँ देखने भर से नशा नहीं होता जान लो साकी,
हम इक ज़ाम हैं हमें होंठो से लगाना होगा ......
हमारी आह से पानी मे भी अंगारे दहक जाते हैं ;
हमसे मिलकर मुर्दों के भी दिल धड़क जाते हैं ..
गुस्ताख़ी मत करना हमसे दिल लगाने की साकी ;
हमारी नज़रों से टकराकर मय के प्याले चटक जाते हैं॥
25 Jan 2011
सीने से गम गुज़रते रहे रेल की तरह
--मुनव्वर राणा
नादान है वो कितना कुछ समझता ही नही है फ़राज
सीने से लगा के पूछता है कि धडकन तेज क्यो है ?
--अहमद फराज़
बिछड़ना उसकी ख्वाहिश थी न मेरी आरजू लेकिन
जरा सी हिचक ने...ये कारनामा कराया है
--अज्ञात
अब देखते हैं हम दोनों कैसे जुदा हो पायेंगे
तुम मुकद्दर का लिखा कहते हो हम अपनी दुआ को आजमाएंगे
--अज्ञात
मौत भी कम खूबसूरत तो नहीं होगी
जो इसको देखता है जिंदगानी छोड़ जाता है
--अज्ञात
कर रहा था गम-ए-जहां का हिसाब
आज तुम याद बेहिसाब आये
--फैज अहमद फैज
कईं दर्दों को अब दिल में जगह मिल जायेगी
वो गया कुछ जगह खाली इतनी छोड़ कर
--अज्ञात
माना के हर एक की जिंदगी में गम आते हैं मगर
जितने गम मुझे मिले उतनी मेरी उम्र न थी.
--अज्ञात
अफवाह किसी ने फैलाई थी तेरे शहर में होने की,
मैं हर एक दर पर मुकद्दर आज़माता रहा..
--अज्ञात
कभी चाहत भरे दिन रात अच्छे नही लगते
कभी अच्छे तालुकात भी अच्छे नही लगते
कभी दिल चाहता है उसकी मूठी में धडकना
कभी हाथो में उसके हाथ भी अच्छे नही लगते
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मेरी दास्तान-ए-हसरत वो सुना सुना के रोये
मेरे आजमाने वाले मुझे आजमा के रोये
कोई ऐसा अहल-ए-दिल हो के फ़साना-ए-मोहब्बत
मैं उसे सुना के रोऊँ, वो मुझे सुना के रोये
मेरे पास से गुजार कर मेरा हाल तक न पूछा
मैं ये कैसे मान जाऊं के वो दूर जा के रोये
--अहमद फराज़
तेरे क़रीब वो देखा नहीं गया
वो ले गया तुझे,रोका नहीं गया
यादें उभर गईं,बातें निखर गईं
मैं रात भर जगा ,सोया नहीं गया
तुझसे बिछुड़ गए ,फिर भी जुड़े रहे
तेरे ख़याल को तोडा नहीं गया
कितने बरस हुए , तेरी खबर नहीं
तेरे सिवाय कुछ ,सोचा नहीं गया
हर मोड़ पर मिले ,कितने हँसीन रंग
फिर भी कभी ये दिल, मोड़ा नहीं गया
कुछ साल एक दम, आकर खड़े हुए
ख़त देख तो लिया ,खोला नहीं गया
आसान था जिसे , कहना बहुत तुझे
वो ढाई लफ्ज़ भी , बोला नहीं गया
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खैरात मैं मिली ख़ुशी मुझे अच्छी नहीं लगती ..
मैं अपने ग़ममें रहता हूँ नवाबो की तरह !!
3 Jan 2011
बहुत पानी बरसता है
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है
यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है
चलो माना कि शहनाई मोहब्बत की निशानी है
मगर वो शख्स जिसकी आ के बेटी बैठ जाती है
बढ़े बूढ़े कुएँ में नेकियाँ क्यों फेंक आते हैं ?
कुएं में छुप के क्यों आखिर ये नेकी बैठ जाती है ?
नक़ाब उलटे हुए गुलशन से वो जब भी गुज़रता है
समझ के फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है
सियासत नफ़रतों का ज़ख्म भरने ही नहीं देती
जहाँ भरने पे आता है तो मक्खी बैठ जाती है
वो दुश्मन ही सही आवाज़ दे उसको मोहब्बत से
सलीक़े से बिठा कर देख हड्डी बैठ जाती है
22 Dec 2010
मेरी ख़्वाहिश है कि फिर से मैं फ़रिश्ता हो जाऊं
माँ से इस तरह लिपट जाऊं कि बच्चा हो जाऊं
कम-से कम बच्चों के होठों की हंसी की ख़ातिर
ऎसी मिट्टी में मिलाना कि खिलौना हो जाऊं
सोचता हूं तो छलक उठती हैं मेरी आँखें
तेरे बारे में न सॊचूं तो अकेला हो जाऊं
चारागर तेरी महारथ पे यक़ीं है लेकिन
क्या ज़ुरूरी है कि हर बार मैं अच्छा हो जाऊं
बेसबब इश्क़ में मरना मुझे मंज़ूर नहीं
शमा तो चाह रही है कि पतंगा हो जाऊं
शायरी कुछ भी हो रुसवा नहीं होने देती
मैं सियासत में चला जाऊं तो नंगा हो जाऊं
मिलना था इत्तफाक, बिछड़ना नसीब था
वो फिर उतनी दूर हो गया, जितना करीब था
बस्ती के सारे लोग ही आतिस-परस्त थे
घर जल रहा था, और समंदर करीब था
अंजुम मैं जीत कर भी यही सोचती रही
जो हार कर गया, वो बड़ा खुशनसीब था
--अंजुम रहबर
राज़-ए-उल्फ़त
राज़-ए-उल्फ़त छुपा के देख लिया
दिल बहोत कुछ जला के देख लिया
और क्या देखने को बाक़ी है
आप से दिल लगा के देख लिया
वो मेरे हो के भी मेरे न हुए
उनको अपना बना के देख लिया
आज उनकी नज़र में कुछ हमने
सबकी नज़रें बचा के देख लिया
'फ़ैज़', तक़्मील-ए-ग़म भी हो न सकी
इश्क़ को आज़मा के देख लिया
आस उस दर से टूटती ही नहीं
जा के देखा, न जा के देख लिया
20 Dec 2010
बिखरे मोती
मुझ से मिल कर उसका उदास होना, मुझे अच्छा नहीं लगता
"हमको बहुत नाज़ था अपनी हँसी पर, खून के आंसू रुलाया ज़िन्दगी ने"
"उसे ये शिकवा के मैं उसे समझ न सका
और मुझे ये नाज़ के मैं जानता बस उसको था "
"थक सा गया है मेरी चाहतों का वजूद,
अब कोई अच्छा भी लगे तो हम इज़हार नहीं करते"
- अज्ञात
"मुझको हँसते हुए इस दुनिया से रुखसत कीजे, कोई रोता है भला जब कोई घर जाता है - मुनव्वर राना"
"एक वो जो मोहब्बत का सिला देता है
ये ज़माना ही वफाओं की सज़ा देता है
वो भी आंसू है जो आग बुझाए दिल की
ये भी आंसू जो दामन जो जला देता है"
"मै मुद्दतों जिया हू किसी दोस्त के बग़ैर
अब तुम भी साथ छोडने को कह रहे हो ख़ैर्..."
"इस बात का रोना नही क्यू तुमने किया दिल बर्बाद किया
इसका गम है के बहुत देर में बर्बाद किया....."
"अब ये भी नही ठीक के हर दर्द मिटा दें
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिये हैं...
"मैंने तो उस रात से आँखे ही नही खोली जिस रात उसने कहा था के सुबह होते ही भूल जाना मुझे ...
"तुम अगर बिखर जाओ
बेबसी में घिर जाओ
दिल से एक सदा देना
बस मुझे बुला लेना,
मैं तुम्हे संभल लूँगा
"ज़िन्दगी में चलने का ,रास्ता बदलने का
एक हुनर सिखा दूंगा
तुम को होसला दूंगा
और जब संभल जाओ
रौशनी में ढल जाओ
मुझ को ये सिला देना
"तुम मुझे भुला देना"
"वो इस अदा से झूठ कहा करती है
कि उसकी हर बात सच लगा करती है
मुझे मालूम है वो नाजनीन बेवफा है
एक तरफ़ा मोहब्बत यु ही हुआ करती है
"काश पास हमारे भी तुमसे तरीके होते
हमारी बातों में भी तुम्हारे से सलीके होते
तुम्हे पाकर भी तुम्हे शायद पा सकता
प्यार के कायदे भी कभी जो हमने सीखे होते
"कांच से कलाई पे मेरा नाम लिखती रही
मेरे नाम से सुर्ख लकीरें निकलती रही
मोहब्बत इतनी थी उसे मेरे नाम से
अपने ही हाथो से मोम सी वो पिघलती रही"
चाहत का ऐसा मज़ा,
तुम लोगों से कहते फिरोगे, मुझे चाहो उसकी तरह"
- अहमद फ़राज़
"उंगलियां आज भी इसी सोच में ग़ुम है फ़राज़
उसने कैसे नये हाथ को थामा होगा"
- अहमद फ़राज़
अशआर
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18 Dec 2010
उदास होने का कोई सबब नहीं होता
कभी कभी तो छलक पड़ती है यूँही आंखें
उदास होने का कोई सबब नहीं होता
ख़ूबसूरत उदास ख़ौफ़ज़दा
वो भी है बीसवीं सदी की तरह
बशीर बद्र
जब बिछडना भी तो हँसते हुये जाना
जब बिछडना भी तो हँसते हुये जाना वरना
हर कोई रूठ के जाने का सबब पूछेगा
बशीर बद्र
ये दुनिया है
ये दुनिया है यहाँ कोई जगह खाली नहीं रहती
किसी के आने जाने से कभी कुछ कम नहीं होता
बशीर बद्र
आँखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा
कश्ती के मुसाफ़िर ने समन्दर नहीं देखा
बेवक़्त अगर जाऊँगा सब चौंक पड़ेंगे
इक उम्र हुई दिन में कभी घर नहीं देखा
जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा
ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं ?
तुम ने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा ?
महबूब का घर हो या बुज़ुर्गों कि ज़मीन
जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़ कर नहीं देखा
ख़त ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हों
इन हाथों ने लेकिन कोई ज़ेवर नहीं देखा
वो मेरे मसाइल को समझ ही नहीं सका
जिस ने मेरी आंखों में समन्दर नहीं देखा
क़ातिल के तरफ़दार का कहना है कि उसने
मक़तूल की गर्दन पे कभी सर नहीं देखा
बशीर बद्र
ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई ना दे
ख़ुदा हमको ऐसी ख़ुदाई ना दे
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई ना दे.