29 Aug 2011

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता

मैं लफ़्ज़ों में कुछ भी इज़हार नहीं करता,
इस का मतलब ये नहीं की मैं तुझे से प्यार नहीं करता..

चाहता हूँ मैं तुझे आज भी पर,
बस तेरी सोच में वक़्त अब अपना बर्बाद नहीं करता...
...
तमाशा न बन जाये कहीं मुहब्बत मेरी,
इस लिए बस अपने दर्द का इज़हार नहीं करता...

जो कुछ मिला है उसी में खुश हूँ मैं अब,
तेरे लिए खुदा से तकरार नहीं करता..

पर कोई तो बात है तेरी "फितरत" में ज़ालिम,
वरना मैं तुझे चाहने की खता बार-बार नहीं करता...

14 Aug 2011

अशआर अहमद फ़राज़

एक ख़लिश अब भी मुझे बेचैन करती है 'फ़राज़'
सुन के मेरे मरने की ख़बर वो रोया क्यों था


इतना तसलसुल तो मेरी साँसों में भी नहीं 'फ़राज़'
जिस रवानी से वो शख्स मुझे याद आता है


मुझ से हर बार नज़रें चुरा लेता है वो 'फ़राज़'
मैंने कागज़ पर भी बना के देखी हैं आँखें उसकी


तुम तक़ल्लुफ़ को भी इखलास समझते हो 'फ़राज़'
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
[ इखलास = सच्चाई ]


कुछ अपने मुक़द्दर में अँधेरे थे 'फ़राज़'
कुछ उसकी याद में दिए बुझा कर रोना अच्छा लगा

बहुत अजीब हैं बंदिशें मोहब्बत की 'फ़राज़'
न उसे क़ैद में रखा न हम फरार हुए


बड़ी मुश्किल से कल रात मैंने सुलाया खुद को
इन आँखों को तेरे ख़्वाब का लालच दे कर


ये वफ़ा तो उन दिनों की बात है 'फ़राज़'
जब मकां कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे


लाख़ ये चाह की उस को भूल जाऊं 'फ़राज़'
हौसला अपनी जगह, बेबसी अपनी जगह


कौन तौलेगा अब हीरों में मेरे आँसूं 'फ़राज़'
वो जो दर्द का ताजिर था दूकान छोड़ गया
[ ताजिर = व्यापारी ]


मेरे सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए


अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं


आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिये
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी


अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद


मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते


अपने सिवा बताओ कभी कुछ मिला भी है तुम्हे
हज़ार बार ली हैं तुमने मेरे दिल की तलाशियां


जिस के पास रहता था दोस्तों का हुजूम
सुना है 'फ़राज़' कल रात एहसास-ए-तन्हाई से मर गया


सारा शहर उसके जनाज़े में था शरीक
मर गया जो शक्स तनहाईयों के खौफ़ से


'फ़राज़' ग़म भी मिलते हैं नसीब वालों को
हर एक के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाने आते हैं


तुझको ये दुःख है कि मेरी चारागरी कैसे हो
मुझे ये गम है कि मेरे ज़ख्म भर न जाएँ कहीं
[ चारागरी = इलाज ]



इस क़दर मुसलसल थीं शिद्दतें जुदाई की
आज पहली बार मैंने उससे बेवफाई की
[ मुसलसल = निरंतर,लगातार ]

वरना अब तलक यूँ था ख्वाहिशों की बारिश में
या तो टूट कर रोया या फिर गज़लसराई की

तज दिया था कल जिन को हमने तेरी चाहत में
आज उनसे मजबूरन ताज़ा आशनाई की
[ आशना = दोस्ती ]

हो चला था जब मुझे इख्तिलाफ अपने से
तूने किस घड़ी ज़ालिम मेरी हमनवाई की
[ इख्तिलाफ = असहमति ]

तन्ज़-ओ-ताना-ओ-तोहमत सब हुनर है नासेह के
आपसे कोई पूछे हमने क्या बुराई की
[ नासेह = सलाहकार ]

फिर क़फ़स में शोर उठा कैदियों का और सय्याद
देखना उड़ा देगा फिर खबर रिहाई की
[ क़फ़स = जेल ] [ सय्याद = Hunter हंटर]

मेरे
सब्र की इन्तेहाँ क्या पूछते हो 'फ़राज़'
वो मेरे सामने रो रहा है किसी और के लिए

अपनी नाकामी का एक ये भी सबब है 'फ़राज़'
चीज़ जो मांगते है सबसे जुदा मांगते हैं

आप खुद ही अपनी अदाओं में ज़रा ग़ौर कीजिए
हम अर्ज़ करेंगे तो शिकायत होगी

अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे 'फ़राज़'
क्यूँ तन्हाँ से हो गए हैं तेरे जाने के बाद

मेरे शिकवों पे उस ने हंस कर कहा 'फ़राज़'
किस ने की थी वफ़ा जो हम करते

13 Aug 2011

जाने क्यों शिक़स्त का अज़ाब लिए फिरता हूँ

जाने क्यों शिक़स्त का अज़ाब लिए फिरता हूँ
मैं क्या हूँ और क्या ख्वाब लिए फिरता हूँ

उसने एक बार किया था सवाल-ए-मोहब्बत
मैं हर लम्हा वफ़ा का जवाब लिए फिरता हूँ

उसने पूछा कब से नही सोए
मैं तब से रत-जगों का हिसाब लिए फिरता हूँ

उसकी ख्वाहिश थी के मेरी आँखों में पानी देखे
मैं उस वक़्त से आंसुओं का सैलाब लिए फिरता हूँ

अफ़सोस के फिर भी वो मेरी ना हुई "फ़राज़"
मैं जिस की आरज़ुओं की किताब लिए फिरता हूँ .

--अहमद फ़राज़

6 Aug 2011

अशआर

बिछड़ते वक़्त उसने कहा था न सवाल करना ,
न जवाब मिलेगा मुझे भूल जाना करार मिलेगा हम उस मुकाम पर थे …
न सवाल किया न जवाब मिला न भूल सके न करार मिला

एक अरसे बाद मिले तो मेरा नाम पूछ लिया
उसने बिछड़ते वक़्त जिसने कहा था तुम्हारी बहुत याद आएगी

25 Jul 2011

बेशर्म लड़की

तितली के पंखों से,

गुलाब की पंखुड़ियों,

मोरपंखी के सूखे पत्तों से

किताब सजाती है,

वह एक लड़की।

पर इसे पढ़ नहीं पायेगी वह।

उसे तो पढ़ना है

घर-आंगन, चूल्हे की राख,

बच्चों का गू-मूत,

पति का पौरुष (अत्याचार),

बताती है मां,

अपने अब तक के अनुभव से।

फिर भी नहीं छोड़ती

किताबों में छिपाना, रंगीन पत्तियां,

मन में उड़ाना, रंगीन तितलियां,

सपने सजाना,

बेशर्म लड़की।

देखती है सपने

सफेद घोड़े पर सवार राजकुमार के।

सोती रहती है

बियावान में बने,

अपने सपनों के महल में,

अकेले सदियों तक,

सोती सुन्दरी के सपने के साथ।

तब भी,

जब कराहती है

एक डिब्बा किरासिन

एक माचिस की तीली के डर से।

जली आत्मा, जला तन लेकर,

अपनों को छोड़ कर,

सपनों को तोड़ कर,

सदियों की नींद से

जाग नहीं पाती है,

बेशर्म लड़की।

खड़ी हैं चौराहों पर,

जांघों के बीच खुजातीं

बेशर्म आंखें,

बजातीं सीटियां, कसती फब्तियां।

नजरें झुकाकर ,

थोडा सटपटाकर,

स्कूल जाना क्यों,

पढ़ना-पढ़ाना क्यों,

छोड़ नहीं पाती है

बेशर्म लड़की।

आई जो गर्भ में,

खडे़ हो गये कितने सवाल।

क्या है, लड़का या लड़की?

लड़की ?

गर्भ रखना है क्या ?

जन्मने से पहले ही

चिमटियों से खींचकर नोंच ली जाती है,

बोटी-बोटी कर दिया जाता है शरीर।

खुश होती है मां,

अब नाराज नहीं होंगे ‘वो’

खुश होता है ‘बाप’

एक मुसीबत तो टली।

फिर उसी गर्भ में,

हत्यारी दुनियां में,

बार-बार आना क्यों

छोड़ नहीं पाती है

बेशर्म लड़की।

रचनाकार:
डॉ. अरविन्द दुबे

18 Jul 2011

बिखरे मोती

1)वो आएगी घर पर मेरे सुन कर मौत की खबर मेरी
यारो ज़रा कफन हटा देना
कम से कम दीदार तो होगा
मय्यत को मेरी देख के अगर रो दे तो उठा देना
अगर खामोश रहे तो चेहरा छुपा देना

हमसे अगर वो करती है मोहब्बत तो इजहार वो करेगी
अगर न करे इजहार तो ज़ालिम को धक्के मार के घर निकाल देना

2)बहुत चाह मगर उन्हें भुला न सके,
खयालों में किसी और को ला न सके.

उनको देख के आँसू तो पोंछ लिए,
पर किसी और को देख के मुस्कुरा न सके.


3)खा कर फरेब और दगा जमाने में रह गये
हम दोस्ती का फ़र्ज़ निभाने में रह गये
एक पल में दुनिया हमसे आगे निकल गई
हम दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गये

4)जिक्र इतना किया तेरा कि तू बेवफा हो गया
नाम इतना लिया तेरा कि खुदा भी खफा हो गया
मुमकिन नहीं अब तो कि पीछे लौट जाये हम
मानते है गुनाह था,पर जो हो गया सो हो गया

मुदतें हो गयी देखे तुझको,पर दिल पे तेरा ही साया है
आँखों में आज तलक वो मंजर समाया है
काश आसा होता इतना यादो को मिटा पाना
जैसे तेरा नाम रेत पे लिख-लिख के मिटाया है

5)आशक़ी सब्रतलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ ख़ूने-जिगर होने तक ।
हमने माना, कि तग़ाफुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक ।

6)पीने लगे न खून भी आँसू के साथ-साथ
यों आदमी की प्यास को ज्यादा न दाबिए..

7)सोचा था, इक ग़ज़ल लिखेंगे तुझे याद किये बगैर
ग़ज़ल तो दूर की बात है , एक मतला नहीं लिख पाए

15 Jul 2011

कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया

वो लोग बोहत खुश-किस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिकी करते थे

हम जीते जी मसरूफ रहे
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
काम इश्क के आड़े आता रहा
और इश्क से काम उलझता रहा
फिर आखिर तंग आ कर हमने
दोनों को अधूरा छोड दिया

फैज़ अहमद फैज़

14 Jul 2011

तेरी यादों को सीने से लगाया तो आंसू निकले

उनकी तस्वीर को सीने से लगा लेते है,
इस तरह जुदाई का गम मिटा लेते है,
किसी तरह ज़िक्र हो जाये उनका,
तो हंस कर भीगी पलकें झुका लेते है.


तेरी यादों को सीने से लगाया तो आंसू निकले ,

इस तरह से दिल को बहलाया तो आंसू निकले ,

तेरी महफ़िल तेरे जलवे तेरी बातों का हुनर ,

जब किसी ने आकर सुनाया तो आंसू निकले ,

एक जज्बा था तुम्हे पाने की खवाहिश थी ,

तुमने जब हमको भुलाया तो आंसू निकले ,

तुम हमें कहते थे चश्मे नूर हो मेरे ,

जब हमें आँखों से गिराया तो आंसू निकले ,

दर्द-ए-दिल की कहानी

दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खुब लिखता है


कही पर बेवफा तो कही मुझे मेहबूब लिखता है

कुछ तो रस्म-ए-वफा निभा रहा है वो

हर एक सफ-ए-कहानी मे वो मुझे मजमून लिखता है

लफ्ज़ो की जुस्तजू मेरे संग़ बीते लम्हो से लेता है

स्याही मेरे अश्क़ को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है

कशिश क्यो ना हो उसकी दास्तान-ए-दर्द मे यारो

जब भी ज़िक्र खुद का आता है वो खुद को वफा लिखता है

तहरीरे झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर

खुद को दर्द की मिसाल और कही मजबूर लिखता है


मजमून=जिसपर कुछ कहा या लिखा जाय

4 Jun 2011

फितरत बदलती जिंदगी

मत देख कि कोई शख्श गुनाहगार कितना है.


यह देख कि तेरे साथ वफादार कितना है.

ये मत सोच कि उसे कुछ लोगों से नफ़रत भी है.

यह देख कि उसको तुझसे प्यार कितना है.


मत देख कि वो तनहा क्यूँ बैठता है इतना.


ये देख कि उसे तेरा इन्तिज़ार कितना है.


ये मत पूछ उसको तुझसे प्यार कितना है.


उसको ये बता कि वो तेरा हक़दार कितना है.

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हर मुश्किल इम्तिहान नहीं होती.


मोहब्बत खामोश रहती है, बेजुबान नहीं होती.


एक एक कदम पर फितरत बदलती है जिंदगी.


जब हमको मंजिलों की पहचान नहीं होती.

मै खुद को फरिश्ता नही कहता

दरिया तो है वो, जिस से किनारे छलक उठाये
बहते हुए पानी को मै दरिया नही कहता
गहराई जो दी तुने मेरे ज़ख्म ए जिगर को
मै इतना समुंद्र को भी गहरा नही कहता
किस किस की तम्मना मे करू प्यार को तक़सीम
हर शक़स को मै जान ए तम्मना नही कहता
करता हूँ मै, अपने गुनाहो पे बहुत नाज़
इंसान हूँ मै खुद को फरिश्ता नही कहता

हम जवाब क्या देते

पत्थर की है दुनियाँ जज़्बात नही समझती
दिल मे क्या है वो बात नही समझती
तन्हा तो चाँद भी है सितारो के बीच
मगर चाँद का दर्द बेवफा रात नही समझती
हम दर्द झेलने से नही डरते
पर उस दर्द के खत्म होने की कोई आस तो हो
दर्द चाहे कितना भी दर्दनाक हो
पर दर्द देने वाले को उसका एहसास तो हो
उनको अपने हाल का हिसाब क्या देते
सवाल सारे गलत थे हम जवाब क्या देते
वो तो लफ्ज़ो की हिफाज़त भी ना कर सके
फिर उनके हाथ मे ज़िन्दगी की पुरी किताब क्या देते

रस्म-ए-वफा

दर्द-ए-दिल की कहानी भी वो खुब लिखता है


कही पर बेवफा तो कही मुझे मेहबूब लिखता है

कुछ तो रस्म-ए-वफा निभा रहा है वो

हर एक सफ-ए-कहानी मे वो मुझे मजमून लिखता है

लफ्ज़ो की जुस्तजू मेरे संग़ बीते लम्हो से लेता है

स्याही मेरे अश्क़ को बनाकर वो हर लम्हा लिखता है

कशिश क्यो ना हो उसकी दास्तान-ए-दर्द मे यारो

जब भी ज़िक्र खुद का आता है वो खुद को वफा लिखता है

तहरीरे झूठ की सजाई है आज उसने अपने चेहरे पर

खुद को दर्द की मिसाल और कही मजबूर लिखता है

1 Jun 2011

ढूंढ़ता तन्हाइयों को इक खुले आकाश में|

ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|
देखता परछाइओं को,
मौत की तलाश में|

आसमां भी रो पड़ा,
ये सोच तनहा है सफ़र|
एक टक वो देखता,
आए कहीं कोई नज़र|
देरों तलक निहारता,
शायद किसी की आस में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

चाँद-तारे सब के सब,
जानते हर बात को|
देखा है सबने साथ ही,
आसमां की बरसात को|
भींगतें हैं वो सभी,
रह आसमां के पास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

चातक को है क्या पड़ा?
स्वाति की इक बूंद का|
चकोर भी है बावड़ा,
चाँद की इक धुन्द का|
जाने क्यूँ परेशां हैं सब?
गुमनाम-से इक प्यास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

बुझती चिराग अब,
जोर है तूफान का|
टूटती दिवार अब,
हर पक्के मकान|
पत्थरों में देख करुणा,
जाने जीतें हैं क्यूँ विश्वास में?
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

ऐ दिल तूँ सुन यूँ ना मचल,
ये असर है उनके साथ का|
वादा किया करतें हैं वो,
क्या भरोसा बात का?
तूँ गुम है इतना क्यूँ भला?
दो पल के एहसास में|
ढूंढ़ता तन्हाइयों को,
इक खुले आकाश में|

ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो

ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो...
Office मे ख़ुश रहो, घर में ख़ुश रहो...
आज पनीर नही है दाल में ही ख़ुश रहो...
आज gym जाने का समय नही, दो क़दम चल के ही ख़ुश रहो...
आज दोस्तो का साथ नही, TV देख के ही ख़ुश रहो...
घर जा नही सकते तो फ़ोन कर के ही ख़ुश रहो...
आज कोई नाराज़ है उसके इस अंदाज़ में भी ख़ुश रहो...
जिसे देख नही सकते उसकी आवाज़ में ही ख़ुश रहो...
जिसे पा नही सकते उसकी याद में ही ख़ुश रहो
Laptop ना मिला तो क्या, Desktop में ही ख़ुश रहो...
बीता हुआ कल जा चुका है उसकी मीठी यादें है उनमे ही ख़ुश रहो...
आने वाले पल का पता नही... सपनो में ही ख़ुश रहो...
हसते हसते ये पल बिताएँगे, आज में ही ख़ुश रहो
ज़िंदगी है छोटी, हर पल में ख़ुश रहो

2 Apr 2011

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत* का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

पहले से मरासिम* न सही, फिर भी कभी तो
रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझ से खफा है, तो ज़माने के लिए आ

एक उमर से हूँ लज्ज़त-ए-गिरया* से भी महरूम
ए राहत-ए-जां मुझको रुलाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-खुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
यह आखिरी शमाएं भी बुझाने के लिए आ


रंजिश = मनमुटाव, नाराज़ी
पिन्दार = अभिमान, गर्व, गुरूर / (कल्पना भी)
मरासिम = सम्बन्ध
लज्ज़त-ए-गिरिया = रोने या आंसुओं का आनंद
राहत-ए-जाँ = जाँ / जिंदगी को सुकून देने वाला

इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ

इस से पहले कि बेवफा हो जाएँ
क्यूँ न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ

तू भी हीरे से बन गया पत्थर
हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें
फिर कहीं और मुब्तिला हो जाएँ

अब के गर तू मिले तो हम तुझसे
ऐसे लिपटें तेरी क़बा हो जाएँ
(क़बा=ड्रेस)

बंदगी हमने छोड़ दी फ़राज़
क्या करें लोग जब खुदा हो जाएँ

अहमद फ़राज़

31 Mar 2011

कभी चढ़ तो कभी उतर जाएँ

कभी चढ़ तो कभी उतर जाएँ
लहर बन कर मगर किधर जाएँ

इसलिए भी कुरेदा करते हैं
ज़ख्म दिल के कहीं ये भर न जाएँ

दिया है ज़ख्म अब न देना दवा
टुकड़े दिल के न सब बिखर जाएँ

लौट आयें हैं हम तेरे दिल से
आप भी बस अब अपने घर जाए

कौन हमको मानाने आएगा
आप ही रूठ कर अगर जाएँ

दिल "सागर" से लगाये ही रखना
भूल से भी न वो सुधर जाएँ

सीने में ज़ख़्म

सीने में ज़ख़्म उतारे चले गए
जो हमपे गुज़री गुज़रे चले गए

उम्र दराजी की दुआ मिली जब
दूर हमसे हमारे चले गए

वोह आएगा एक दिन मिलने हमसे
नाम उसका ही पुकारे चले गए

सर्द हवा का झोखा कुछ ऐसा चला
काफिला छोड़ बंजारे चले गए

कहाँ देखें वो रोशन चिराग "सागर"
मुद्दतें बीती वोह नज़ारे चले गए

1 Feb 2011

रिमझिम: ढेर सारा अँधेरा

रिमझिम: ढेर सारा अँधेरा: "खाली कमरों में हम दिन गुजारते थे काली स्याह रातों का भी वहीँ डेरा था जिस शख्स को उन कमरों में खो दिया बस, दीवारों के इलावा वही शख्स मेरा था..."
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